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मुकुर(यथार्थवादी त्रिगुणात्मक मुक्तक काव्य)(ख) झरोखे से (१)विगत यादों की लम्बी डोर |


इस लघु मुक्तक काव्य की 'वन्दना' के उपरान्त यह पहला खण्ड,कल्पना-


यथार्थ का संगम है | इस रचना में प्रतीकों के माध्यम से पूरे विश्व में 


विचित्र परिवर्तन की और संकेत कियागया है | इतिहास की बहुत अच्छी 


बातों को,भारत की अच्छी बातों पर आधुनिकता की मैली धुल डाल कर न 


तो विदेशी अच्छी बातों को अपना पा रहे हैं,अपितु उनके 'उच्छ्रंखल रूप' 


को ही अपना रहे हैं | अपने दकियानूसी अवशेषों से अलग न होकर, धीरे 


धीरे हम  पुरानी 'महानताओं' को छोडते जा रहे हैं | इस खण्ड में यही 


आशय है |

   
 (सारे चित्र 'गूगल-खोज' से साभार)




विगत यादों की लम्बी डोर |

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‘विगत यादों’ की लम्बी डोर |

‘कल्पना’ के हाथों में छोर ||

‘उड़ चली’,’चिंतन की है पतंग’ |  

‘शान्ति’ की हुयी ‘नींद’ है ‘भंग’||

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‘सूर्य’ तो चला ‘तिमिर के देश’,’क्रान्ति की लाली’ है ‘अवशिष्ट’ |

लिखा जिसमें ‘रक्तिम इतिहास’,’काल ने ‘पलटा है’,’वह पृष्ठ” ||


‘त्राहि’ का ‘उठा’ चादुर्दिक ‘शोर’|

‘मनुजता’ गयी आज किस ओर ??

‘प्यार’ का ‘दुखा’ .अंग-प्रत्यंग’ |

छिड़ गयी,’घृणा-वैर की जंग’ ||

‘शान्ति’ की हुयी ‘नींद’ है ‘भंग’ ||१||


 

‘बादलों’ में ‘पानी’ के साथ,’तड़ित’ की ‘जलती’ ‘भीषण आग’ |

‘पसारे’,’आशाओं के पंख’,लिये ‘मन’ में ‘स्वप्निल अनुराग’ ||

‘झुलस जाते’,‘वन-मन के मोर’|

‘भाग्य’ पर चलता किसका ‘जोर’ ||

‘उछलते अल्हड़’ ‘जले’ ‘कुरंग’ |

‘नियति’ के बड़े ‘निराले ढंग’ ||

‘शान्ति’ की हुयी ‘नींद’ है ‘भंग’ ||२||


‘देवता के लोहू’ से ‘रंगे’,’पहन कर’ ‘वस्त्र’ ‘लिये संन्यास’ |

‘बगल’ में ले ‘छल’ की ‘मृग-क्षाल’,’घूमता गलियों में ‘विशवास’ ||

मचाते फिरते कितना शोर !

‘पाप’ से अंजी’ ‘नयन की कोर’ ||

‘वासना-रति’ को लेकर संग |

‘नाचता’,’नंगा नृत्य’,’अनंग ||

‘शान्ति’ की हुयी ‘नींद’ है ‘भंग’ ||३||



‘चाँदनी’ के ‘यौवन’ पर पड़ी, ‘सघन घन’ की ‘मटमैली दृष्टि’ |

‘आसुओं’ से ‘धोने’‘,अभिशाप’,’रात भर’ हुई ‘अनवरत वृष्टि’ ||

चढीं ‘धूमिल परतें’ हर और और |

किया ‘कोहरे’ ने ‘गँदला’ ‘भोर ||

कहाँ हम जाएँ ‘मीत’ के संग |

‘चढ़ाने’ ‘मधुर प्रीति के रंग’ ||

शान्ति’ की हुयी ‘नींद’ है ‘भंग’ ||४||


 

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण)  – (6 October 2012 at 04:47)  

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (07-10-2012) के चर्चा मंच पर भी की गई है!
सूचनार्थ!

Sriprakash Dimri  – (7 October 2012 at 02:53)  

‘चाँदनी’ के ‘यौवन’ पर पड़ी, ‘सघन घन’ की ‘मटमैली दृष्टि’ |

‘आसुओं’ से ‘धोने’‘,अभिशाप’,’रात भर’ हुई ‘अनवरत वृष्टि’ ||
सभी मुक्तक बहुत सुन्दर,,, भाव पूर्ण...शुभ कामनाएं

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