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मुकुर(यथार्थवादी त्रिगुणात्मक मुक्तक काव्य) (ग)मीनार (१) प्रगति का घट


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‘प्रगति का घट’,’प्रेम-जल से रह गया रीता |


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छल रहा है हमें कितना ‘स्वर्ण-सम्मोहन’|

मुक्त हाथों से किया ‘अधिकार का दोहन’ ||

भूल कर,’कर्त्तव्य की भावों भरी गीता’ ||

‘प्रगति का घट’,’प्रेम-जल से रह गया रीता ||१||


‘लोभ की दीवार में हैं, ‘स्वार्थ की ईंटें’ |

‘भवन’ में जो रह रहे हैं, क्यों न सिर पीटें ||

इस तरह’आज़ाद भारत’ का समय बीता ||

‘प्रगति का घट’,’प्रेम-जल से रह गया रीता ||२||


‘आज का गणतन्त्र’ कितना बन गया ‘धन-तन्त्र’ ||

कई नेताओं के घर में, है कहाँ ‘जन तन्त्र’ ??

‘मानवी मन्त्रों’ से मन्त्री दूर है जीता ||

‘प्रगति का घट’,’प्रेम-जल से रह गया रीता ||३||


रोटियों की जगह खाते,’चुनावी सौगन्ध’ |

ठग रहे हैं देश को, ये ‘चुनावी अनुबन्ध’ ||

‘आदमी’ ही ‘आदमी’ का है ‘लहू’ पीता ||

‘प्रगति का घट’,’प्रेम-जल से रह गया रीता ||४||


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डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण)  – (13 October 2012 at 05:58)  

वाह...
बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (14-10-2012) के चर्चा मंच पर भी की गई है!
सूचनार्थ!

कविता रावत  – (13 October 2012 at 06:01)  

बहुत सुन्दर प्रस्तुति

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