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मुकुर(यथार्थवादी त्रिगुणात्मक मुक्तक काव्य) (घ) (छल-का जाल) (१) छल की गागर( जीवन दर्शन का गीत)



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'छल' की गागर छलकी रे !

हवा चली जहरीली हल्की हल्की रे !!

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कपट हाथ में विनाश ढपली |

बजा रही है तृष्णा पगली ||

मिटा 'आज ' को चिंता करती -

देखो कितनी 'कल' की रे !!

छल की गागर छल की रे ||||

  • अरे ततैया सुन्दर लगती |

  • स में डसे तो आग सुलगती||

धोखा नजर न खाये देखो-

बर रखो पल-पल की रे !!

छल की गागर छ्लकी रे !!२!!

 

उर के सारे भाव खोल कर |

मन के मोती सब टटोल कर ||

भेद खोलती चुपके चुपके -

नयन से बूँदें ढलकी रे !!

छल की गागर छलकी रे !!३!!


रात रोशनी निगल चुकी है |

ओढ़ कालिमा निकल चुकी है ||

इन जलते बुझते तारों की -

चमक दिखाती झलकी रे !!

छल की गागर छलकी रे !!४!!

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ई. प्रदीप कुमार साहनी  – (17 October 2012 at 23:55)  

बहुत खूबसूरत गीत |

नई पोस्ट:- ठूंठ

Devdutta Prasoon  – (19 October 2012 at 19:22)  

'सत्य' को स्वीकारा,यह 'युग'पर उपकार है |
होता 'यथार्थ सोच'ही देश का सुधार है ||

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