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जून २०१३ के बाद की गज़लें (४) चोट


     (सरे चित्र 'गूगल-खोज' से साभार)

‘आग’ लगी है दशों दिशाओं, ‘धुआँ’ घुटा कितना ‘दमघोंट’ !

‘अनाचार-आघात’ जटिल हैं, कैसे सहेगी धरती ‘चोट’ !!

कहते हैं ‘काली कमली’ पर, चढता कोई ‘रंग’ नहीं-

फिर कैसे  ‘बदरंग’ हो गये, कुछ ‘इंसाफी काले कोट’ ??


‘उम्मीदों’  का  एक  ‘खज़ाना’,  धरा  हुआ  बेकार  यहाँ -

चुन  कर  कई संजोये ‘सिक्के’, हर ‘सिक्के’ में कितना खोट !!

आज कहाँ इन्साफ गरीबों के ‘दामन’ में सजता है ?

‘न्याय की नगरी’ में पाओगे, न्याय के नाम पे ‘लूट-खसोट’ ||

गहरी ‘सरिता’, ‘नैया’ जर्जर, दूर कहीं ‘पतवार’ पड़ी-

तैर के कैसे पार करें हम, लदी हुई ‘पापों की मोट’ ||

प्यार की मैं उम्मीद करूँगा, किससे बोलो कहाँ कहाँ ?

आज ‘प्रेम’ के ‘बाज़ारों’ में, ‘इंसानों’ से बढ़ कर ‘नोट’ ||

“प्रसून” कितने खिले हैं सुन्दर, गन्ध का हुआ अनादर है-

विकास के ये मानव-पुतले, ‘बेदिल’ हैं जैसे ‘रोबोट’ ||



Virendra Kumar Sharma  – (1 September 2014 at 17:01)  

प्रसून साहब सारा परिवेश दिया पदार्थ जगत का इन अशआरों में मनोहर आभार टिप्पणियों का।

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