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जून 2014 के बाद की गज़लें/गीत (7) ओ धरती के दुश्मन सुन ! (‘ठहरो मेरी बात सुनो !’ से )

                                                                                         (सरे चित्र 'गूगल-खोज' से साभार)
ताल पाट कर, बाग काट कर, भवन बनाने वाले सुन ! 
धरती के सुन्दर-सुन्दर परिधान मिटाने वाले सुन !
तू अपने वजूद के ख़ातिर | 
बना हुआ है कितना शातिर !!
केवल अपने लिए सोचता, औरों की अब चिन्ता क्या ! 
धरती की आबरू लूट, अस्तित्व बढ़ाने वाले सुन !!
धरती के सुन्दर-सुन्दर परिधान मिटाने वाले सुन !!1!!
    तेरे पापों के कलंक से | 
रुधिर बहा है ‘धरा-अंक’ से ||
तू कष्टों का बना पिटारा, बाँट रहा है सबको दुःख ! 
‘पाप-भाव’ तेरा बिच्छू सा, डंक चुभाने वाले सुन !
धरती के सुन्दर-सुन्दर परिधान मिटाने वाले सुन !!2!!
सदाचार का तू है दुश्मन ! 
अनाचार से भरा तेरा मन !!
है पापों की बड़ी पोटली, तेरे सर पर लदी हुई ! 
दुराचार को अपने कालुषित अंग लगाने वाले सुन !
धरती के सुन्दर-सुन्दर परिधान मिटाने वाले सुन !!3!!
तेरे बोये अंगारों से ! 
ज्वाल झरी है श्रृंगारों से !!
तूने उगला आग का दरिया, अग्निजिव्ह दानव बन कर ! 
सुलग रहीं तेरी करतूतें, अमन जलाने वाले सुन!
धरती के सुन्दर-सुन्दर परिधान मिटाने वाले सुन !!4!!
“प्रसून” वाले हर उपवन में | 
सुख से महके हर आँगन में ||
ज़हर भरी सुइयाँ तेरे व्यवहारों में हैं छुपी हुई ! 
चुपके-चुपके चुभने वाले शूल उगाने वाले सुन !
 धरती के सुन्दर-सुन्दर परिधान मिटाने वाले सुन !!5!!

 


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