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जून 2014 के बाद की गज़लें/गीत (2) मन कितना धुँधला लोगों का !

    (सरे चित्र 'गूगल-खोज' से साभार)

मन कितना धुँधला लोगों का, पापों की परछाईं सा !
अत्याचार बढ़ा है कितना, बड़ी हुई महँगाई सा !!
लोक-तन्त्र की पॉलिश लिपटी, तानाशाही के तन पर-
व्यवस्था का सिस्टम ढीला, बिजली की सप्लाई सा ||
व्यवहारों में भरे सभी गुण, दुनिया का निर्वाह करे-
ऐसा बालक कहाँ मिलेगा, हमको कृष्ण कन्हाई सा ??


समझदार माँ आज कहाँ है, ममता की प्रतिमूर्त्ति बनी- 
किसने कान्हाँ जैसा पाला, पूत यशोदा माई सा ??
मर्यादा-आदर्श नहीं है, राम-भरत सा कहीं बचा-
भ्राता कहाँ मिलेगा बोलो, अब तो लक्ष्मण भाई सा ??
राष्ट्र-हितों में सुख को त्यागे, मोह-राग जो जीत सके-
त्याग कहाँ, बलिदान कहाँ है, अब तो पन्ना दाई सा ??
गीत और संगीत की मैना-कोकिल कर्कश हुईं सभी-
घोले मिसरी, मीठा मोहक, स्वर न रहा शहनाई सा !!


राँझा-हीर न कहीं एक भी, अब शीरी-फ़रहाद नहीं-
आज सोहनी-महीवाल का प्यार हुआ दुखदाई सा !!
दान करे तो नाम कमा ले, अखबारों की सुर्खी में-
दानवीर अब कर्ण कहाँ है, कौन है हातिमताई सा ??
सेवाभाव में राजनीति की गन्ध मिली है रची-बसी-
व्यवहारों पर असर हुआ है, स्वार्थ-पगी भलाई सा !!
मतलब पर जोड़े हर रिश्ता, असली मन का प्यार नहीं-
स्वाद प्यार का आज हुआ है, नक़ली दूध-मलाई सा !!
कामुक प्रीति है मर्यादा से हीन “प्रसून” करें अब क्या ?
वफ़ा से खाली हुआ प्यार का हर भँवरा हरजाई सा || 

     

vibha rani Shrivastava  – (4 September 2014 at 18:58)  

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