Powered by Blogger.

Followers

शंख-नाद(एक ओज गुणीय काव्य)-(र)-चलो बचाएं देश को !! (रूपक-गीत) (३) समाधान (!! आओ बचा लें देश को !!)

चित्र 'गूगल-खोज' से साभार


!! आओ 

  
   बचा   


 लें देश को !!

!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!


आओ बचा लें देश को !

================

‘धरती की दुर्दम प्यास’ ने |

‘सत्ता मिले’ इस आस ने ||

‘हर एकता’ को छल लिया-

‘बिखरे हुये विशवास’ने ||

मत-भेद इतने बढ़ गये-

‘दल-दल’ में यह फँसने लगा |

आओ निकालें देश को !

आओ बचा लें देश को !!१!!


हर सुख बढ़ा,राहत बढ़ी |

फिर और भी चाहत बढ़ी ||

‘पथ’बहुत ‘चिकने’ हो गये –

‘सुविधा की चिकनाहट’ बढ़ी ||


गति दे गयी हम को दगा-

यह लडखडा गिरने लगा |

आओ सँभालें देश को !

आओ बचा लें देश को !!२!!
  
‘निष्ठा’ पर हुये ‘प्रहार ने |

‘लालच के कुटिल कुठार’ ने ||

तोड़ा है कैसा संगठन !

देखो तो ‘भ्रष्टाचार’ ने !!


इस ‘प्रेम-मन्दिर’ में कोई-

‘कुबेर’ आ बसने लगा-    

इससे हटा लें देश को |

आओ बचा लें देश को !!३!!
 
हमको यही अब खेद है |

भावों में सबके भेद है ||

खेला विदेशों ने इसे –

समझा इसे तो ‘गेंद’ है ||


‘गन्दी सियासत’ का कोई-

यह खेल अब खलने लगा-

अब मत उछालें देश को |

आओ बचा लें देश को !!४!!


कितने ‘अँधेरे’ बढ़ गये !

‘कुण्ठा के घेरे’ बढ़ गये ||

‘क्यारी’ में हर “प्रसून” की-

‘काँटे घनेरे’ बढ़ गये ||

‘काला अँधेरा’ नाग सा-

‘उम्मीद’ को डसने लगा |

दें कुछ उजाले देश को |

आओ बचा लें देश को !!५!!

****====****====****

Post a Comment

About This Blog

  © Blogger template Shush by Ourblogtemplates.com 2009

Back to TOP