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जून 2014 के बाद की गज़लें/गीत (12) नीति-गीत(नहीं चाहिये ! ('ठहरो मेरी बात सुनो' से)

 (सरे चित्र 'गूगल-खोज' से साभार)
कपट उगलते शैतानों का कोई प्रणेता नहीं चाहिये !
विकास की नौटंकी करता, ऐसा नेता नहीं चाहिये !!
करे-धरे कुछ नहीं, कागज़ों में बस अपना देश सुधारे |
सबकी दौलत बटोर कर जो, अपनी झूठी शान बघारे ||
दोनों हाथों माल समेटे, भरता उदर गिलहरी सा-
अपना मोटा पेट भरे जो, सब कुछ लेता नहीं चाहिये ! 
विकास की नौटंकी करता, सा नेता नहीं चाहिये !!1!!
जिसके अत्याचार सभी ने, नये-नये हर रोज़ सहे |
सपने में भी नहीं निभाता, करके वादे नित्य नये ||
अपने हक़ में बजट बनाता, रोज़ कोष को खाली कर-
पर जनता का कोइ हिस्सा, कभी न देता, नहीं चाहिये ! 
विकास की नौटंकी करता, ऐसा नेता नहीं चाहिये !!2!!
पाप-नीति पर हर दिन चलता, धर्म-नीति से रहे परे |
अच्छाई से खाली-खाली, जिसमें सारे व्यसन भरे ||
पूरी तरह खोखला हो जो, केवल मोटा जिस्म लिये-
मक्खन निकले हुये दूध सा, वह सपरेटा नहीं चाहिये !
विकास की नौटंकी करता, ऐसा नेता नहीं चाहिये !!3!!
फूटे हुये ढोल सा खोखल, जिसमें कोई ताल नहीं |
रीते हुये लिफाफे जैसा, जिसमें बिल्कुल माल नहीं ||
पी कर जाम नशे में डूबा, लगा के तकिया मसनद पर-
ख्याली पुलाव पकाता रहता, लेटा-लेटा नहीं चाहिये ! 
विकास की नौटंकी करता, ऐसा नेता नहीं चाहिये !!4!!
काम न आता कभी किसी के, खाली हुआ ख़जाना जो |
दर्द पराये देख-देख कर, चुप रहता अनजाना जो ||
कभी किसी के हाथ में रहता, कभी किसी के हाथों में-
आड़े वक्त में काम न आये, सिक्का खोटा नहीं चाहिये ! 
विकास की नौटंकी करता, ऐसा नेता नहीं चाहिये !!5!!
  

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