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राजनीति की कानी कुतिया (एक हकीकत)



राजनीति की कानी कुतिया (देवदत्त"प्रसून")
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देखो कितनी गर्म है भय्या चर्चा आज चुनावों की |
सब के मन पर भारी गठरी , स्वार्थ भरे दबावों की ||
पार न लग पायेगा बेड़ा,कैसे तट मिल पायेंगे?
छेदों से हैं चोटिल तलियाँ,नेताओं की नावों की ||
राजनीति की कानी कुतिया घूम रही है गली गली-
आँख मूँद कर देख रही है,जन्नत जीत के ख़्वाबों की || 
तेरे घर में,मेरे घर में सब के घर में आती है-
वोट की थाली सूँघ रही है, मानो थाल पुलावों की ||
 
"प्रसून"सियासत
आज लुटेरी फांस के जाल में ठगतीहै- 
हमें लुभाती और दिखाती,झूठी बगिया वादों की ||

Kailash Sharma  – (4 July 2012 at 07:40)  

बहुत सटीक और सुन्दर प्रस्तुति....

रविकर फैजाबादी  – (5 July 2012 at 06:44)  

सब सितार गंज में जमे, काली पीली भीत |
पर प्रसून तो शूल से, नहीं पा रहा जीत ||

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