Powered by Blogger.

Followers

जादू है मक्कारी का (मेरे ग्रन्थ -'ठहरो मेरी बात सुनो' से)

    

जादू है मक्कारी का |
देखो खेल मदारी का ||
==============================

    
आता फिरता गली गली |
भोली पब्लिक बड़ी भली ||
है बेचारी गयी छली |
रंग विरंगे वेश बदल|
नये नये  परिवेश बदल ||
पाँच साल में आता है |
गीत सुहाने गाता है||
बड़ा काईयाँ जादूगर|
डोल रहा देखो घर- घर ||
उसके कन्धे टंगा हुआ |
'छल' के रँग से रँगा हुआ ||
है थैला अय्यारी का |
किया है नाटक यारी का ||
देखो खेल मदारी का ||१||
   



सीधा सादा लगा हमें |
लेकन कितना ठगा हमें ||
दिया है देखो दगा हमें |
काम वासना का रेला |
खेल घिनौना है खेला ||
फांस के किसी प्रलोभन में |
दाग लगा कर यौवन में ||
कितनी कलियाँ मसल गया |
कोमलताएं कुचल गया ||
मानवता को भुला दिया |
बेहोशी में सुला दिया ||
बन गया दुश्मन नारी का |
दानव निठुर निठारी का ||
देखो खेल मदारी का ||२||
    
 
सीमाओं में छेद कई |
बाहर हो गये भेद कई  ||
देश में बो गये 'खेद' कई  |
भारत के कुछ लोग़ बिके|
खोजी सारे ढूँढ थके ||
छुपा हुआ मक्कार है वह |
इस धरती का भार है वह ||
वह दौलत का भूखा है |
इंसाँ नहीं, बिझूका है ||             खेत का  पुतला     
                   -------                   -----------------
चुपके चुपके चोरी से |
दुश्मन की गठ्जोरी से ||
लगा है घुन गद्दारी का ||
खाया अन्न बुखारी का ||
देखो खेल मदारी का ||३||
    
बाग में बच्चे खेल रहे |
कसरत डंडें पेल रहे ||
कर आपस में मेल रहे |
हाथ हाक्थ में डाले हैं |
अरमानों को पाले हैं||
प्रेमी प्रेयसि घूम रहे |
इक दूजे को चूम रहे ||
कितने सहमे सहमे हैं |
फीके प्यार के नगमे हैं ||
प्यार दबा शंकाओं में |
चाह दबी दुविधाओं में ||
डर फैला बमबारी का |
भय है मारामारी का ||
देखो खेल मदारी का ||४||
   

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण)  – (25 June 2012 at 06:01)  

एक मदारी पूरी दुनिया को नचा रहा है!
इसी का नाम जिन्दगी है!
अच्छी रचना!

Post a Comment

About This Blog

  © Blogger template Shush by Ourblogtemplates.com 2009

Back to TOP