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गज़ल-कुञ्ज(गज़ल संग्रह)-(य)उकाव-कबूतर-(१)देखिये (प्रतीकों में नग्न सत्य}

 

















































उकाबों की सेहतें,पहले से बेहतर देखिये |


डरे, सहमे हकों के हैं कितने तीतर देखिये || 





                                                                          
                                 
'जुल्म' के पत्थर से करना चोट उनका खेल है -


चोट खा कर गिर पड़े कितने कबूतर देखिये ||
    
 नुमायश करते हैं मीठे बोल की हम आये दिन- 


 पैनी नुकीली सोच कितनी दिल के भीतर देखिये || 


  
'प्रीति-मृगछौने' के तन पर घाव गहरा,दर्द है-


नफ़रतों के शिकारी ने मारा खंज़र देखिये ||



घूमते फिरते आवारा,बाज बागी हो गये |


तन अबाबीलों  के घायल लहू से तर देखिये ||

  


 चढाने के लिये कैसे बाग से लायें "प्रसून"-




छुपे हैं ख़ूनी दरिंदे, कई अंदर देखिये ||
 

दिलबाग विर्क  – (11 July 2012 at 08:57)  

आपकी पोस्ट कल 12/7/2012 के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
कृपया पधारें

चर्चा - 938 :चर्चाकार-दिलबाग विर्क

दिगम्बर नासवा  – (12 July 2012 at 03:35)  

जबरदस्त ... प्रभावी गज़ल ... सार्थक चिंतन ...

Asha Saxena  – (12 July 2012 at 04:35)  

चित्र बहुत अच्छे चुने हैं अपने विचारों के लिए |

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण)  – (12 July 2012 at 04:39)  

भोली चिड़िया बाज को, समझ रहीं है मीत।
रक्षक ही भक्षक बने, ये दुनिया की रीत।।

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