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क्यों ?-क्यों नहीं ??

अन्धेरे का जाल जब इतना विकराल है।
फिर हमारे हाथों में क्यों नही मशाल है??
वर्षों तक शोषण से संघर्ष होते रहे--
जोंकें आज फिर क्यों इतनी बहाल हैं ??


नसीहत,हक़परस्ती लिक्जी है किताबों में -
फिर क्यों झूठ के दरिंदे निहाल हैं??
चमकीली खोखली सहेजी गयीं सीपियाँ-
पैरों के नीचे क्यों मोती और प्रवाल हैं??
कारूँ या कुबेरोंके पुजारी कंचन में -
डूबे,क्यों इनके दिल प्यार से कंगाल हैं??
बरसे हैं बरसों से,समाधान के ये घन-
अभी तक क्यों न बुझे ये जलते सवाल हैं??
खुशामद के जंगल में,चाटुकार सियार खुश-
भेडिये,खूँख्वार, मक्कार खुशहाल हैं||
भूखे खरगोश, हिरण घूम रहे व्याकुल से-
लोमड़ समेटे कुछ टेंटों में माल है||
मुर्झाये मुर्झाये हैं कमल के"'प्रसून"क्यों ?
मैले कुचैले क्यों तालों में शैवाल हैं??

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देख कर हर आदमी दंग होता है

देख कर हर आदमी दंग होता है।
जब किसी बेटी का खुला अंगहोता है।।
रति के इशारो पर नाचता है बेचारा--
बदनाम फिर भी अनंग होता है।।
मेनका को रोको दिगंबर नर्तन से-
कौशिक का संयमअब भंग होता है।।
इंसान हो इंसान के बच्चे उठाओ मत-
यह किसी भेड़िये का ढंग होता है।।
इंसान बस वही है "प्रसून" जिसके--
इंसानियत का जज्वा संग होता है।।

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डोर तुम्हारे हाथों में (देवदत्त प्रसून)


मेरी साँस की  डोर  तुम्हारे  हाथों  में  । 
है  दामन  का  छोर  तुम्हारे हाथों  में ।। 
प्यासा  जैसे रहा  हो  कोई सावन में  - 
खडा  लिये  उम्मीद  जैसे   आँगन  में  ।। 
तुम  आये  मन  भीग  उठा, आनन्द मिला - 
मैं हूँ  हर्ष विभोर, प्रेम सौगातों   में  । 
नाच  उठे ज्यों मोर सघन बरसातों में ।।1।। 
लम्बी बिरह के बाद  तुम्हारी  पहुनाई ।
जैसे बादल  हटे पूर्णिमा  खिल  आयी  ।। 
बिखरा  सुन्दर  हास,धरा के आँचल में  - 
ज्यों  खुश  हुए  चकोर , चाँदनी रातों में ।।2।। 
मिलन  की वीण से पीडित मन बहलाओ  । 
तार   प्यार  के  धीरे  धीरे   सहलाओ  ।।  
अँगुली  का  वरदान   जगे  मीठी सरगम । 
छुपे  हैं मीठे  शोर,  मधुर आघातों    में   । 
डूबी  हर  टंकोर ,मृदुल   सुर सातों  में   ।।3।। 
मैंने   मन की  कह ली, तुम भी बोलो तो  । 
मेरे  कानों में भी मधु रस घोलो तो   ।।
है  मिठास मिसरी  सी कितनी स्वाद  भरी - 
हे  प्रियतम  चितचोर , तुम्हारी  बातों में  । 
सुख मिल गयाअथोर ,स्नेह के नातों में  ।।4 ।।
"प्रसून "तेरी  याद  इस तरह मन में  है  - 
मीठी मीठी गन्ध  महकती सुमन में है  ।। 
कोई सुन्दर मोती  मानों सीप में  हो  - 
उतरे  जैसे  हंस  बगुल  की  पाँतों  में  ।
या  शबनम  की  बूँद कमल  की पाँतों में।।5।। 

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"अनुराग कहाँ है" (देवदत्त प्रसून)


हीर का अनुराग कहाँ है?
राँझे का वो त्याग कहाँ है?
मृत्यु वरण कर साथ न छोड़े,
ऐसी उर में आग कहाँ है?।।१।।

भीगी पलकोँ में जो गाये,
पीडा में जो स्वत्व भुलाये।।
जो विषाद में हास पिरोये ,
ऐसा मधुरिम राग कहाँ है ?।।२।।

कहाँ सती की अटल तपस्या?
रीति प्रीति की बनी समस्या।
कहाँ गया फ़रहाद का परिश्रम?
वह शीरी बेदाग कहाँ है ?।।३।।

हँस-हँस कर काँटोँ पर चलना
प्रियतम के संग वन में रहना।।
जल कर अग्नि परीक्षा दे कर-
तपे सो सत्य सुहाग कहा है ?।।४।।

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होली आयी है (देवदत्त 'प्रसून' )



आओ खेले फाग, होली आयी है।

गायें मीठे राग, होली आयी है।।

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पीड़ा भरी चुभन ये सारी भूले हैं।

डाल डाल पर देखो भँवरे झूले हैं।।

सुन कर मीठे गीत, रसीले मतवाले,

गुमसुम कलियों के ये गुच्छे फूले हैं।।

देखो खिल गये बाग,होली आयी है।

महका प्रेम पराग,होली आयी है।।1।।



वैर भाव का कहीं भी कोई काम नहीं।

कलह और प्रतिकार का लेना नाम नहीं।।

बिसरा दो कटुतायें,आओ गले मिलें--

प्यार की गति पर देखो लगे विराम नहीं।।

मन में है अनुराग,होली आयी है।

छोड़ो हर वैराग ,होली आयी है।।2।।



स्नेह सभी के सीने में भरपूर रहे।

मत कोई अपने ग़रूर में चूर रहे।।

"प्रसून" डूबे हर मन ऐसी मस्ती में-

उछली कीचड़ से हर आँचल दूर रहे।।

लगे न कोई दाग़, होली आयी है।

हों रिश्ते बेदाग़, होली आयी है।।3।।

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"नेह तुम्हारी आँखों में" (देवदत्त प्रसून"

तिर आया है नेह तुम्हारी आँखों में।
खिले सुहाना रूप कमल की पाँखों में।।

खुल जाए मुख जब तुम मोहक हँसी हँसो।
खिलते सुन्दर फूल चमेली शाखों में।।

पा करके मुस्कान होंठ यूँ सजे हैं ज्यों।
उज्जवल हीरे धरे चमकते ताखों में।।

है मीठे उपहार उम्र की बगिया में।
गुच्छे हुए जवान रस भरे दाखों में।।

रूप तुम्हारा नहीं किसी से मिलता है
अतुलनीय तुम प्रिये! हजारों-लाखों में।।

"प्रसून" तेरी याद हृदय मे ऐसे ज्यों
मोती बन गई बून्द सीप की काँखों में।।

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