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घनाक्षरी वाटिका |षष्ठम् कुञ्ज(मिलन-पथ) प्रथम पादप(प्रेम-योग) (ख)अटूट प्रेम |

(सारे चित्र 'गूगल-खोज' से साभार) 
साधना में 'रहस्यवाद' 
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‘प्रेम के पुजारी हैं तो, हटा के सभी से ‘मन’,
और एक ‘पिय’ से ही ‘लगन’ लगाइये !
कोई हों ‘हालात’ पर, बनी रहे ‘आस’ और,
‘उस’ से ही ‘मिलन’ की ‘ललक’ जगाइये !!



‘मन के बगीचे’ में हों, ‘पौधे सच्चे प्रेम के’ ही,
‘प्रेम’ फले फूले ऐसी ‘फ़सल’ उगाइये !!
‘घृणा-वैर’ के ‘दुराव’, ‘छल’ औ ‘कपट’ आदि,
के जो ‘पशु’ चरें ‘उसे’, ‘उन’ को भगाइये !!१!!

         

‘सारे स्वाद’ ‘उसी’ की, दिलायें याद ‘आठों याम’,
‘एक प्रेम’ छोड़ सारे ‘स्वाद’ भूल जाइये !
उपजे ‘उसी’ का ‘नाद’, मीठा ‘उसी’ का ‘निनाद’,
‘प्रीति वाली वीणा’ ऐसी, ‘ध्यान’ में बजाइये !!



और ‘उसी धुन’ पे जो, नाचे झूमे ले के ‘मज़े’,
‘आप’ ऐसी ‘मस्त मृगी’ जैसे बन जाइये !!
‘ध्यान’ में मिलेंगे ‘पिया’, ‘सूरत’ लगे जो ‘साँची’,
‘गली-गली’ ‘जहाँ-तहाँ,’ जा के न मंझाइये !!२!!


‘रूप’, ‘चहेते’ का ही, ‘पलकों’ में बन्द कर,
हटा के ‘सभी’ से ‘ध्यान’ उसी पे जमाइये !
छोड़ के ‘लगाव’ सारे, हटा के ‘सभी’ से ‘चित्त’,
एक ‘उसी प्यारे’ में ही, ‘दिल’ को रमाइये !!



‘मन के सदन’ से, निकाल कर ‘राग’ सारे,
‘रूप’, ‘निज प्यारे’ का ही, ‘उस’ में बसाइये !!
जो भी करें ‘काम’ सारे, सौंपें ‘पिया’ को ही आप,
हर ‘काम’ में ‘आनन्द’ उस का ही पाइये !!३!!


  मेरे ब्लॉग 'साहित्य-प्रसून' पर   'नयी करवट' (दोहा-ग़ज़लों पर एक काव्य ) में आप का स्वागत है !            

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घनाक्षरी वाटिका |षष्ठम् कुञ्ज(मिलन-पथ)प्रथम पादप(प्रेम-योग) (क)समर्पण)

(सारे चित्र 'गूगल-खोज' से साभार)


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‘कामनायें’, ‘इन्द्रियों के स्वाद’, चखने के लिये,

आयें, उन्हें ‘मन के सदन’ से भगाइये !

चाह ‘किसी और’ की तो, ‘सपने’ में भी न करे,

‘प्रिय’ की ही इच्छा निज ‘चित्त’ में जगाइये !!

‘आनन्द-विभोर मोर’ जैसे ‘बादलों’ में रमे,

इसी तरह ‘मन’ बिज ;प्रेमी’ में रामाइये !!

‘व्यवधान’-हीन ‘अवधान’ से लगा के ‘मन’,

‘एक दिश’ हो के ‘ध्यान’, ‘प्रिय’ में लगाइये !!१!!


‘श्रद्धा’ और ‘आस्था’ से, ‘एकनिष्ठ’, हो के सदा,

‘इच्छा-डोर’ से तो ‘प्रीति’ उस से ही जोड़िये !

‘बीतरागी’ हो के और,’चाहतों की दौड़’ रोक,

‘चित्त’ का लगाव ‘सारी वस्तुओं’ से मोड़िये !!



कर के समर्पित, ‘कर्म’ निभाते हुये’

निज ‘कर्त्तव्य-भाव’ कभी भी न छोड़िये !!

एक ‘प्रेम’ सत्य, शेष ‘नाटक’ जगत सारा,

 सोच ऐसे ‘आनन्द’ के ‘रस’ को निचोड़िये !!२!!


‘साधन’ में ‘वही’, और ‘साधन’ में एक ‘वही’,

‘साधना’ में ‘वही’, यही तथ्य जान लीजिये !  
 
‘जीवन के सारे ही दस्तूर’ हैं ‘उसी’ के लिये,

‘सारी सम्पदायें’ हैं ‘उसी’ की मान लीजिये !!


सारे ‘अनुराग’, ‘मन-मीत’ को समर्पित,

कर के ‘संसार-भोग’-‘रस-पान’ कीजिये !!

खुले न ‘रहस्य’ किन्तु, ’प्रेम’ का किसी पे कभी,

भूल से भी, बात ऐसी आप मान लीजिये !!३!!

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शब्द कोष 
अवधान=ध्यान की स्थिरता
 मेरे ब्लॉग 'साहित्य-प्रसून' पर   नयी करवट (दोहा-ग़ज़लों पर एक काव्य ) में आप का स्वागत है !
        

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