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सभ्यता (एक नवीन तम गीत)

सभ्यता  का विकास निर्वस्त्रता से स-वस्त्रता के रूप में हुआ है |यदि अब हम निर्वस्त्रता को अपना रहे हैं तो कैसे कहें कि हम सभ्य हैं ? इस सब्य्ता के परिणाम हम सब देख ही रहे हैं | नग्नता  और नशाखोरी  के कारण मानव की 'यौन-पिपासा' ने  पशुओं को  भी पीछे छोड़ दिया है !
(सारे चित्र 'गूगल-खोज' से साभार)

मेरे ग्रन्थ 'ठहरो मेरी बात सुनो !' में नयी रचना 


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(१५अप्रैल-२०१३ को एक अबोध बालिका से हुये ‘दुष्कर्म’ की प्रतिक्रया)
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‘विधि के विधान’ की बनायी हुई ‘सभ्यता’ |
विश्व में ‘वरदान’ सी लायी  हुई ‘सभ्यता’ ||
ऐसी  पड़ी  चोट आज ‘युग के बदलाव’ की-
‘काल के गाल’ में समायी  हुई  ‘सभ्यता’ ||

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‘ताप’ सह लिये गरीब ने ‘जठर की आग’ के |
जल गये  हैं ‘वृक्ष’ सारे ‘चाहतों के बाग’ के ||
पजर पजर के विचारी, देखो  ‘राख’ बन गयी-
‘भट्टियों’ में किस तरह  तपायी हुई ‘सभ्यता |
‘काल के गाल’  में समायी  हुई  ‘सभ्यता’ ||१||


‘नग्नता’  हमारा चलन  है  नहीं  रहा  कभी  |
‘लाज-हीनता’ को हमने  है  नहीं  सहा  कभी ||
हमें  ‘पूर्वजों’ ने  ‘मरजाद  का  सबक’  दिया-
विदेशियों द्वारा  यह  बतायी  हुई  ‘सभ्यता’ |
‘काल के गाल’  में समायी  हुई  ‘सभ्यता’ ||२||



‘रूप की जवानी’  कण्टकों  से  भर गयी कहीं |
‘दहेज़’ के लिये ‘प्रीति’ जल के मर गयी कहीं ||
चढ़ी  है  भेंट  ‘लोभ की सुलग रही अग्नि’ से-
‘पाप की आग’  में  जलायी  हुई  ‘सभ्यता’ |
‘काल के गाल’  में समायी  हुई  ‘सभ्यता’ ||३||


बालिका-किशोरियों का  रेप  कर दिया गया |
‘कौमार्य-“प्रसून’’’ में  ‘अंगार’ भर दिया  गया ||
‘वहशियों’ की ‘भूख’  की यह शिकार हो गयी-
‘मौत के आगोश’ में सुलायी  हुई  ‘सभ्यता’ |
‘कालके गाल’  में समायी  हुई  ‘सभ्यता’ ||४||



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जादू है मक्कारी का (मेरे ग्रन्थ -'ठहरो मेरी बात सुनो' से)

    

जादू है मक्कारी का |
देखो खेल मदारी का ||
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आता फिरता गली गली |
भोली पब्लिक बड़ी भली ||
है बेचारी गयी छली |
रंग विरंगे वेश बदल|
नये नये  परिवेश बदल ||
पाँच साल में आता है |
गीत सुहाने गाता है||
बड़ा काईयाँ जादूगर|
डोल रहा देखो घर- घर ||
उसके कन्धे टंगा हुआ |
'छल' के रँग से रँगा हुआ ||
है थैला अय्यारी का |
किया है नाटक यारी का ||
देखो खेल मदारी का ||१||
   



सीधा सादा लगा हमें |
लेकन कितना ठगा हमें ||
दिया है देखो दगा हमें |
काम वासना का रेला |
खेल घिनौना है खेला ||
फांस के किसी प्रलोभन में |
दाग लगा कर यौवन में ||
कितनी कलियाँ मसल गया |
कोमलताएं कुचल गया ||
मानवता को भुला दिया |
बेहोशी में सुला दिया ||
बन गया दुश्मन नारी का |
दानव निठुर निठारी का ||
देखो खेल मदारी का ||२||
    
 
सीमाओं में छेद कई |
बाहर हो गये भेद कई  ||
देश में बो गये 'खेद' कई  |
भारत के कुछ लोग़ बिके|
खोजी सारे ढूँढ थके ||
छुपा हुआ मक्कार है वह |
इस धरती का भार है वह ||
वह दौलत का भूखा है |
इंसाँ नहीं, बिझूका है ||             खेत का  पुतला     
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चुपके चुपके चोरी से |
दुश्मन की गठ्जोरी से ||
लगा है घुन गद्दारी का ||
खाया अन्न बुखारी का ||
देखो खेल मदारी का ||३||
    
बाग में बच्चे खेल रहे |
कसरत डंडें पेल रहे ||
कर आपस में मेल रहे |
हाथ हाक्थ में डाले हैं |
अरमानों को पाले हैं||
प्रेमी प्रेयसि घूम रहे |
इक दूजे को चूम रहे ||
कितने सहमे सहमे हैं |
फीके प्यार के नगमे हैं ||
प्यार दबा शंकाओं में |
चाह दबी दुविधाओं में ||
डर फैला बमबारी का |
भय है मारामारी का ||
देखो खेल मदारी का ||४||
   

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