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ज़लजला(क)वन्दना (२) मातृ-वन्दना(सरस्वती-वन्दना) - माँ तू मुझे भी तार दे !


        

  (सरस्वती-वन्दना)

   

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    माँ तू मुझे भी तार दे !

  
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जग तारिणी ! भव-तारिणी !!
माँ,तू मुझे भी तार दे !!

   

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सागर गहन,लहरें विकट | भय मृत्यु का कितना विकट !!
जो हों डूबते | तट ढूँढते ||
उनकू तू मातु उतार दे !!
जग तारिणी ! भव-तारिणी !! माँ,तू मुझे भी तार दे !!१!!
             
              

           

अज्ञान का यहाँ क्लेश है | कितना निठुर परिवेश है ||
जग क्लिष्ट है | तम श्लिष्ट है ||
इसमें तूज्योती उतार दे !!
जग तारिणी ! भव-तारिणी !! माँ,तू मुझे भी तार दे !!२!!

       

धूमिल यहाँ हर भाव है | सब से सभी को दुराव है ||
मेरा मन मलिन | पंकिल पुलिन ||      ( पुलिन =तालाब का किनारा )
तू हर कलुष को निखार दे !!
जग तारिणी ! भव-तारिणी !! माँ,तू मुझे भी तार दे !!३!!
    

सोया हुआ विशवास है | पापों भरी हर साँस है ||
हर दोष हर ! परितोष भर !!
बिगड़ी मेरी सुधार दे !!
जग तारिणी ! भव-तारिणी !! माँ,तू मुझे भी तार दे !!४!!

 

दूषण सने ‘भव-गीत’ हैं | छलना भरे ‘संगीत’ हैं ||
सत्-सुर सजे | वीणा बजे ||
ऐसी ‘मधुर ‘झंकार’ दे !!
जग तारिणी ! भव-तारिणी !! माँ,तू मुझे भी तार दे !!५!!



‘अघ’,’औघ’ से जग सुप्त है | ‘जागृति’ यहाँ से लुप्त है ||
‘परितोष’ कर ! ‘उद्बोध’ भर !!
कर दूर तू ‘कुविकार’ दे !!
जग तारिणी ! भव-तारिणी !! माँ,तू मुझे भी तार दे !!६!!

 

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ज़लज़ला (भीषण परिवर्तन) (क)वन्दना) (१)ईश-वन्दना)-हे प्रभु उतरो इस धरती पर !!



ज़लज़ला

(भीषण  परिवर्तन)



स्वतंत्रता' का 'धीरज टूटा |



हे प्रभु उतरो इस धरती पर !!


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कलि'ने अपना 'बिगुल' बजाया |

'पुण्य-दलन अभियान ' चलाया ||


चली 'वासना' अपनी बाहें 'तृष्णा' की बाहों में डाले |


तुम्हें छोड़ कर कौन जगत में जो इन सब से सृष्टिबचा ले !! 



'राजनीति'बन ठन कर निकली |



खेल' खेल कर स्वाँग सा झूठा-



ठठ्ठा मार रही है जी भर | 



हे प्रभु उतरो इस धरती पर !!१!!


 


हैं 'विनाश' ने नयना खोले | 


'धर्म-रत्न 'सब छिपे टटोले ||







लगता इन्हें लूटने आया,'दुराग्रह' को साथ में लाकर |


'मानवता की रत्न-पिटारी' पटकी,खोली, और हिलाकर ||


चुरा लिए हैं  'शील के मोती '|


किया है अपहृत 'प्रेम अनूठा '|


'विश्वासों की माला' ली हर |


हे प्रभु उतरो इस धरती पर !!२!! 



नाच रही है अट्टहास कर |


चहुँ तरफा मैली कुवास भर ||


धसक धसक कर धरा डोलती,लगता कोई ज़लज़ला आया |


'सज्जनता' को पीड़ा पहुँची,न७यनोन नीर छलकता आया ||


'हिंसा','छलना',सहेलियाँ दो,


'मर्यादा' को दिखा अंगूठा |


निकली हैं, लगता मद पी कर |

हे प्रभु उतरो इस धरती पर !!३!!



चला  'स्वेच्छाचार'  रौंदने |



'मानवता'  की जड़ें खोदने ||



'करुणा ',' दया 'औ 'ममता ' भागीं,छुपने अपनी 'लाज 'बचाने |


संयम,नियम के बन्धन तोड़े,'मनमानी ' का नाच नचाने ||


ज्यों हिंसक मरखने बैल ने, 


तोड़ दिया हो अपना खूँटा |   


कुचल रहा हो,सबको जी भर |




हे प्रभु उतरो इस धरती पर !!४!!


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ज्वालामुखी (एक गरम जोश काव्य) (क)वन्दना (४) राष्ट्र-वन्दना


             
        

राष्ट्र-वन्दना


(मेरे भारत देश)


       ! मेरे भारत देश,स्वर्ग से

   सुन्दर और सु रूप हो तुम !



    
  
  


शान्त चित्त तुम, अवढर दानी-आगत के सत्कारक हो ! 

हृदय विशाल गगन सा व्यापक,चिर गंभीर विचारक हो !!

‘धर्म-भेद’ से रहित ‘स्व्च्छ्मन’,’मानवता’ का रूप हो तुम !!

तुम सा कौन जगत में होगा,तुलना-हीन अनूप हो तुम !!१!!


  
  



सहन शक्ति है असीम शिव सी,जग जाते तो रौद्र महा |

वैरी को भी गले लगाया, उसका अत्याचार सहा ||

पर जब तूमने ‘करवट बदली’,’विप्लव’ हो,’विद्रूप’ हो तुम !

तुम सा कौन जगत में होगा,तुलना-हीन अनूप हो तुम !!२!!



  


‘ओज-अनल’ को सहेज रखते,’शान्त ज्वालामुखी’ हो तुम !

तुम न कभी हो सत्ता लोलुप,है तुम में अनंत संयम ||


दैत्य जब आक्रामक होते, ‘त्रिदेव के प्रारूप’ हो तुम !!

तुम सा कौन जगत में होगा,तुलना-हीन अनूप हो तुम !!३!!

 

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