Powered by Blogger.

Followers

Showing posts with label गीत(यथार्थ-गीत. Show all posts
Showing posts with label गीत(यथार्थ-गीत. Show all posts

सामयिकी ज्वालामुखी(एक ओजगुणीय काव्य) में नयी रचनायें ‘(सामयिक परिस्थिति’ में !) (क)देश की दशा | (१) दिल्ली में दरिन्दगी


 (सारे चित्र 'गूगल-खोज' से साभार)

==============


<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<< 
जेठ  से  अधिक  प्रचण्ड  ’हृदय’ में  धधकी  है ‘ज्वाला’ !

‘काल’ ने अपने ‘आँचल’ में ज्यों किसी ‘आग’ को  पाला ||

<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<< 
‘पीड़ा  भरी  कराह’  उठ  रही,  ‘दर्द  भरी’  है ‘सिसकी’ |

ऐसी, ‘अमन की देवी’  पर,  ‘बदनज़र’ पड़ी है किसकी ??

धीरे   धीरे  ‘आँसू’    रिसते,  ‘नयन’  हो   गये  गीले-

‘मानवता’  को ‘दर्द’  हुआ  ज्यों,  दुखा  हो कोई ‘छाला’ ||

जेठ  से  अधिक  प्रचण्ड,  ’हृदय’  में धधकी है ‘ज्वाला’ !

‘काल’ ने अपने ‘आँचल’ में ज्यों,किसी ‘आग’ को पाला ||१||


 ‘लाज की हिरणी’  तड़फ़  तडफ  कर, लेती ‘अन्तिम साँसें’

डसने  को ‘वासना  की  नागिन’,  आई  इसे  कहाँ से ??

‘संयम’  टूट  गया,  ‘धीरज’  ने  अपनी  ‘करवट’ बदली –

लिख  न  जाये  ‘इतिहास’  में  ‘खूनी पृष्ठ कोई काला’ ||


जेठ  से अधिक  प्रचण्ड , ’हृदय’  में  धधकी है ‘ज्वाला’ !

‘काल’ ने अपने ‘आँचल’ में ज्यों किसी ‘आग’ को पाला ||२||


अब  नारी  की  ‘सहन-शक्ति’  की ‘बन्धन-डोरी’ टूटी |

‘अबला’  है  वह,  ‘बात पुरानी’  हुई  है  सारी झूठी ||

पाकर ‘अतिशय चोट’ हिली है इस ‘धरती’ की काया’-

लगता है,  अब ‘प्रलय’ यहाँ पर निश्चय आने वाला ||

बाहर कितनी  ‘ठण्ड’,  ’हृदय’  में  धधकी है ‘ज्वाला’ !
'काल’ ने अपने ‘आँचल’ में ज्यों ‘आग’ को  पाला ||३||


पुरखों  ने  जो  'बाग'  यहाँ  थे सुन्दर कई लगाये |

इनमें  धोखे  से  ‘विष वाले’, “प्रसून” कुछ उग आये ||

इनके  ‘ज़हरीलेपन’  से  हम  कितने  हुये  विकल हैं-

जिसने इनका ‘स्वाद’ चखा है, ‘काल’ का हुआ ‘निवाला’ ||

जेठ  से  अधिक  प्रचण्ड,  ’हृदय’ में धधकी है ‘ज्वाला’ !

‘काल’ ने अपने ‘आँचल’ में ज्यों किसी‘आग’ को है पाला||४||


<<<<<<<<<<<<<<*************>>>>>>>>>>>>>

Read more...

About This Blog

  © Blogger template Shush by Ourblogtemplates.com 2009

Back to TOP