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मुकुर(यथार्थवादी त्रिगुणात्मक मुक्तक काव्य) (ट)विराग- गीत | (२)चोट पर चोट | (यथार्थ-दर्पण)


'अच्छाइयों' के साथ बुराइयां'भी बढती है, यह ठीक ही है क्यों कि यह 'प्रकृति'का नियम है | यह सन्तुलन बना रहे,तो अच्छा है | किन्तु यदि 'अच्छाई' की तुलना में 'बुराई' कई  गुना बढ़ जाये, तो चलेगा क्या?यह असन्तुलन ठीक वैसा ही है जैसे,बोये गये अन्न-बीजों के साथ 'खरपतवार' 'फसल' से की गुना बढ़ कर 'फसल' ही चौपट कर दे | (चित्र 'गूगल-खोज' से साभार) 




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हम तो ‘चोट’ पर ‘चोट’ खाने लगे |
‘नयनों’ में औ ‘अश्रु’ आने लगे ||
‘दर्द भरे गीत’ विवश गाने लगे ||
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‘मौसमों’ ने बदली आज ऐसी ‘नज़र’ |
ले आई ऐसा आज ‘बदली’, ‘कहर’ ||
‘नभ’ से गिरी ‘करुणा की धार’ ज़ार ज़ार |
हुआ नहीं ‘ऊसर’ में रंच भी सुधार ||
‘सुमनों’ के ‘मनों’ को सताने लगे |
‘बागों’ औ ‘वनों’ को सताने लगे ||
‘काँटों की फसलें’ उगाने लगे |
हम तो ‘चोट’ पर ‘चोट’ खाने लगे ||१||


‘रोशनी’ के ‘प्यासों’ की देखिये ‘समझ’ |
लोग हो गये हैं आज कितने ‘नासमझ’ !!
‘ज्योति’ की तलाश में सारा ‘संसार’ |
बुन लिया किन्तु ‘चारों ओर’ ‘अन्धकार’ ||
‘जुगुनुओं के गाँव’ जगमगाने लगे |
‘तारों के पाँव’ डगमगाने लगे ||
‘चन्दा’ को ‘दाँव’ पर लगाने लगे |
हम तो ‘चोट’ पर ‘चोट’ खाने लगे ||२||

‘प्रणय-दान’ कैसे करें ‘सजनी-सजन’ !
बहुत कठिन हो गया है ‘सुख मय शयन’ ||
चढ़ गये हैं ‘आसमान’ पर यहाँ ‘बजार’ |
‘चाहत की भूख’ और है ‘बेशुमार’ ||
‘मन-विहंग’ पंख फड़फड़ाने लगे |
‘मधुर स्वप्न’ तोड़ कर जगाने लगे ||
‘निराशा के दर्द-गीत’ गाने लगे |
हम तो ‘चोट’ पर ‘चोट’ खाने लगे ||३||

‘नाश के कगार’ पर खड़ा है ‘विकास’ |


‘आस्था’ से कट चला और ‘विश्वास’ ||
‘पत्थरों’ से भी ‘कठोर’, हो गया ‘दुलार’ |
और ‘स्नेह’ बन गया है आज ‘व्यापार’ ||
‘कौड़ी-मोल’लोग ‘दिल’ बिकाने लगे |
‘भावना’ की खिल्लियाँ उड़ाने लगे ||
‘वासना’ को अंग से लगाने लगे |
हम तो ‘चोट’ पर ‘चोट’ खाने लगे ||४||


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ज़लजला(एक भीषण परिवर्तन) (ख)भूचाल भय का (१) !!त्रासदी-त्रासदी- त्रासदी-त्रासदी!!



(सारे चित्र ,गूगल क्गोज से साभार)


हालाँकि भोपाल गैस त्रासदी अब कालातीत हो गयी है,पर त्रासदी तो त्रासदी है ; चाहे 

वह 'महँगाई' की  हो या 'आतंकों' की,'भ्रष्टाचार' की हो या 'शोषण' की, 'नारी-उत्पीडन' 

की या 'भ्रूण-ह्त्या' की, 'दहेज' की हो या 'घूस खोरी' की ! उजागर न सही,चोरी छिपे 

ही सही,हमें वह कचोट तो रही ही है ! अत: मुझे लगता है, यह रचना आज भी सटीक 

है | आप सादर आमंत्रित हैं इस 'यथार्थ-उदघाटन-यज्ञ' में !! 
                    
!!त्रासदी-त्रासदी-
त्रासदी-त्रासदी!!
!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!


‘पूरब की भोली भव्यता’ |
‘पश्चिम की विकसित सभ्यता’ ||
उफ़,चोट करारी दे गयी-
हर दिशा को यह ‘होतव्यता’ !!



जिधर ध्यान होगा |
जिधर कान होगा ||
जिधर दृष्टि डालो |
जिधर मुहँ उठा लो ||

‘इस ओर’देखो | ‘उस ओर’देखो ||
‘इधर’त्रासदी है | ‘उधर’त्रासदी है ||
 त्रासदी-त्रासदी-त्रासदी-त्रासदी !!१!!



व्याप रही हर देश में |
ठोस,तरल या गैस में ||
दिशि दिशि में,हर कोण में –
घूम रही हर वेश में ||
न कुछ ज्ञान होगा |
न अनुमान होगा ||
जिधर पग बढ़ा लो |
जिधर खोज पालो ||
रचती है यह नाश का खेल,रखती-
नहीं कोई कोरो कसर त्रासदी है ||
त्रासदी-त्रासदी-त्रासदी-त्रासदी !!२!!



वीर जनों की ‘शक्ति’ में |
धीर जनों की ‘भक्ति’ में ||
‘सज्जन-मन अनमोल’ में-
‘सद्गुण मय अनुरक्ति’ में ||
यही भान होगा |
यह संज्ञान होगा ||
कोई ‘गीत’ गा लो |
कोई ‘धुन’ बजा लो ||
हर इक अदा,हर अंदाज़ में ही-
रखती यों अपना असर त्रासदी है ||
त्रासदी-त्रासदी-त्रासदी-त्रासदी !!३!!



====!!!!!!!!!!!!!====

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ज़लजला(एक भीषण परिवर्तन) ((क)वन्दनाज़लजला(एक भीषण परिवर्तन) ((क)वन्दना (४) राष्ट्र-वन्दना ! मेरे भारत देश ! (अ)


कल गणेश चतुर्थी के पर्व पर भारतीय गण राज्य के तूफानी परिवर्तन की वेदना जब असह्य हो गयी तो एक पुराने गीत से भाव-व्यक्त करना उचित समझा |एक लंबा 'पद्धरी-गीत' दो भागों में प्रस्तुत है | लीजिये उसका प्रथम भाग !




! मेरे भारत देश !
  


मेरे भारत देश तुम्हारा,रहा सदा इतिहास मनोहर!
‘मानवता’औ ‘सत्य-अहिंसा-प्रेम’,तुम्हारे रहे धरोहर ||
‘छल-प्रपञ्च औ प्रवन्चना’ से, सदा दूर तुम रहे अनोखे-
पर ‘आगन्तुक-अतिथि गणों’, ने दिये तुम्हें धोखे ही धोखे ||१||

 

तुमने दे कर शरण सभी को,’शरणागत की आन’ निभाई |
यहाँ रहा जो भी,उसको थे बाँटे,धन-साधन सुख दायी ||
‘भाषा सबकी,सब की संस्कृति’,तुम में रही,फली औ फूली |
सब धर्मों का किया मान वह,बड़ा हो या हो अति मामूली ||२||


राम,कृष्ण,गौतम,कनिष्क औ चन्द्रगुप्त सब पले यहाँ पर |
अकबर,राणा,शिवा,जफ़र औ गाँधी,फूले फले यहाँ पर ||
संकरित,हिन्दी,अरबी,उर्दू,अंग्रेज़ीसब तुमने बोलीं |
कई रंग के तितली,भँवरों,और पंछियों की हर टोली ||३||-

 

रही तुम्हारी प्रीति-वाटिका में मिल जुल कर सदा प्यारसे |
फल खाये,या पराग-मधु पी,सुख में बीते दिन दुलार से ||
किन्तु कई ऐसे भी पनपे, जो थे भीषण अत्याचारी |
नादिर से, चंगेज़खान से,‘मानवता’ के लिये ‘कटारी’ ||४||

 

‘छुरा तुम्हारी पीठ में घोंपा’,आम्भीक ने,‘जय चन्दों’ ने |
वाजिदअली, मीरजाफ़र से सत्ता के लोभी अन्धों ने ||
और फ़िरंगी गोरे बन्दर, मधुवन में जब से घुस आये |
हाथ बढ़ा कर सुन्दर सुन्दर फूल और फल तोड़े खाये ||५||

कुचल कुचल कर‘सुमन-क्यारियाँ’,रौंदीं,मलिन किया‘कुसुमाकर |
‘शहद’और‘जीवनी-सुरस’ सब जमा किये बाहर ले जा कर ||
 कसा ‘शिकंजा छल का’, हाथों पाँवों में जन्जीरें कस दीं |
तुमको ‘दास’ बनाने की थीं ‘उलटी पुलटी चालें’ चल दीं ||६||



और यहाँ की ‘संस्कृति’ पर थी ऐसी गँदली छाप लगा दी |
बदल दिया ‘इतिहास’,’नाश की ढपली, पर यों थाप लगा दी ||
‘सत्ता-मद,खिताब के जूठे-झूठे मान’ के भूखे ‘कूकर’ |
बाँधे‘सोने-चाँदी की जंजीरों’में गोरों ने कास कर ||७||


‘आंगल-सत्ता के चंगुल’ से, तुम्हें छुड़ाया ‘दीवानों’ने |
‘जज्वों के मरहम’ से ‘सारे घाव’ भर दिये ‘मस्तानों’ ने ||
‘स्वतन्त्रता की दीप-शिखा’ पर,प्राण हट दुए ‘परवानों ने ||
थक कर ‘छोड़ दिया’ भारत को ‘रक्त पी रहे हैवानों’ ने ||८||


मेरे प्यारे वतन सुहाने! तब तुमने पाई आज़ादी !
किन्तु ‘तुम्हारी सन्तानों’ ने,’गरिमा की खेतियाँ’ जला दीं ||
‘स्वार्थ,घृणा की आग’जला कर, ‘लोभ और तृष्णा-ईंधन’ में |
‘ज्ञान-प्रेम-धन’ छोड़ रमे हैं,अब ‘इनके ओछे मन’ धन में ||९||
                                 (क्रमश:)
       


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