Powered by Blogger.

Followers

पिया की होली |(दो गीत) (१) ‘अंग-अंग’ में ‘प्यार’ की भरो ‘उमंग’ पिया !





!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

अब की होली में यों डालो रंग पिया !

‘अंग-अंग’ में ‘प्यार’ की भरो ‘उमंग’ पिया !!

!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!


मिलने की कामना’ ह्रदय में जागी है |
 
लहर लहर  ‘संयम-सागर’ में बागी है ||

‘चाहत की सीपियाँ’ हैं देखो उतरायीं-

 चलो चलें मधुवन में दोनों संग पिया !!

अब की होली में यों डालों रंग पिया !

‘अंग-अंग’ में ‘प्यार’ की भरो उमंग’ पिया !!१!!


देखो कितना ‘प्रेम-दीवाना’ ‘भँवरा’ है |

 किसी फूल पर जाने को ‘बेसबरा’ है ||

एक दूसरे ने की ऐसी ‘पहुनाई’ 


‘रति’ से मिलने मानों चला ‘अनंग’ पिया ||

अब की होली में यों डालों रंग पिया !

‘अंग-अंग’ में ‘प्यार’ की भरो उमंग’ पिया !!२!!

बढ़े दिनों दिन प्रीति’ कभी भी घटे नहीं | ‘

लगन की डोरी’ टूटे मत या कटे नहीं ||

हो यह ‘मिलन’,‘अखिल जीवन’ को सुखदायी-



मन के गगन ऐसी उड़े ‘पतंग’ पिया||

 अब की होली में यों डालों रंग पिया !

‘अंग-अंग’ में ‘प्यार’ की भरो उमंग’ पिया !!३!!







‘रस की धारा’ बन कर ‘प्रीति का राग’ बहे |
'नस-नस’ में ठाठें मारे ‘अनुराग’ बहे ||

‘मधुर मिलन’ की ऐसी बाजे ‘शहनाई’-

बाजें ‘हृदय’ में ‘वीणा और मृदंग’ पिया ||

अब की होली में यों डालों रंग पिया !

‘अंग-अंग’ में ‘प्यार’ की भरो उमंग’ पिया !!४!!



“प्रसून” वन-बागों में देखो हैं महके |

 ‘’झुण्ड कोयलों के’ हैं मदमाते चहके ||

 सोई ‘इच्छाओं’ ने ली है अंगड़ाई - 



भर दी है ‘उत्साह की एक तरंग’ पिया ||

अब की होली में यों डालों रंग पिया !

'अंग-अंग में ‘प्यार’ की भरो उमंग’ पिया !!५!!


!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!


Read more...

मुकुर (ठ)दरारें (१)टूटते व्यवहार



======


=======
आपस के व्यवहार टूटते देखे हैं |
नाते’ रिश्तेदार टूटते देखे हैं ||
=======================
पैसों से बिक गये ‘हीर औ राँझे’ हाँ !
सपनों में दिखते ‘सोना, चाँदी, पैसा ||
इस ‘पैसे के लोभ’ के निठुर दबावों से-
क़समें खा कर, ‘प्यार’ टूटते देखे हैं ||
आपस के व्यवहार टूटते देखे हैं |
नाते’ रिश्तेदार टूटते देखे हैं ||१||

‘विश्वासों के काँटों’ में चलते राही |
बड़ी कठिन इन काँटों में आवाजाही ||
इतनी ‘चुभन’ मिली है, छलनी पाँव हुये-
रो रो हो कर ज़ार टूटते देखे हैं ||
आपस के व्यवहार टूटते देखे हैं |
नाते’ रिश्तेदार टूटते देखे हैं ||२||

‘मिलन’ की बातें सुनीं, हुये हम दीवाने |
‘उल्लासों’ से गूँथे प्रेम से पहनाने ||
बड़ी बेरहम चोट वक्त के हाथों की-
वे ‘फूलों के हार’ टूटते देखे हैं ||
आपस के व्यवहार टूटते देखे हैं |
नाते’ रिश्तेदार टूटते देखे हैं ||३||

डूब रही ‘सभ्यता-नाव’, मँझधारों में |
कई ‘मसीहा नाविक’ लगे सुधारों में ||
“प्रसून”, ‘भौतिक वित्त्वाद-तूफ़ानों’ में-
‘नावों के पतवार’ टूटते देखे हैं ||
आपस के व्यवहार टूटते देखे हैं |
नाते’ रिश्तेदार टूटते देखे हैं ||४||
======================

Read more...

About This Blog

  © Blogger template Shush by Ourblogtemplates.com 2009

Back to TOP