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डोर तुम्हारे हाथों में (देवदत्त प्रसून)


मेरी साँस की  डोर  तुम्हारे  हाथों  में  । 
है  दामन  का  छोर  तुम्हारे हाथों  में ।। 
प्यासा  जैसे रहा  हो  कोई सावन में  - 
खडा  लिये  उम्मीद  जैसे   आँगन  में  ।। 
तुम  आये  मन  भीग  उठा, आनन्द मिला - 
मैं हूँ  हर्ष विभोर, प्रेम सौगातों   में  । 
नाच  उठे ज्यों मोर सघन बरसातों में ।।1।। 
लम्बी बिरह के बाद  तुम्हारी  पहुनाई ।
जैसे बादल  हटे पूर्णिमा  खिल  आयी  ।। 
बिखरा  सुन्दर  हास,धरा के आँचल में  - 
ज्यों  खुश  हुए  चकोर , चाँदनी रातों में ।।2।। 
मिलन  की वीण से पीडित मन बहलाओ  । 
तार   प्यार  के  धीरे  धीरे   सहलाओ  ।।  
अँगुली  का  वरदान   जगे  मीठी सरगम । 
छुपे  हैं मीठे  शोर,  मधुर आघातों    में   । 
डूबी  हर  टंकोर ,मृदुल   सुर सातों  में   ।।3।। 
मैंने   मन की  कह ली, तुम भी बोलो तो  । 
मेरे  कानों में भी मधु रस घोलो तो   ।।
है  मिठास मिसरी  सी कितनी स्वाद  भरी - 
हे  प्रियतम  चितचोर , तुम्हारी  बातों में  । 
सुख मिल गयाअथोर ,स्नेह के नातों में  ।।4 ।।
"प्रसून "तेरी  याद  इस तरह मन में  है  - 
मीठी मीठी गन्ध  महकती सुमन में है  ।। 
कोई सुन्दर मोती  मानों सीप में  हो  - 
उतरे  जैसे  हंस  बगुल  की  पाँतों  में  ।
या  शबनम  की  बूँद कमल  की पाँतों में।।5।। 

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण)  – (19 March 2011 at 03:50)  

बहुत सुन्दर रचना!
होली की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ!

Onkar  – (19 September 2015 at 06:30)  

बहुत बढ़िया

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