(खुद को मत बहलाएँ !) ‘ठहरो मेरी बात सुनो’ से !
>> Thursday, 6 November 2014 –
गीत
गंगा-स्नान/नानक-जयन्ती(कार्त्तिक-पूर्णिमा) की सभी मित्रों को वधाई एवं तन-मन-रूह की शुद्धि हेतु मंगल कामना !
(सारे चित्र' 'गूगल-खोज' से साभार)
प्रदूषणों से
इसे बचा कर, मन इसमें नहलाएँ !
आज प्यार की गंगा हम सब, मिल कर स्वच्छ बनाएँ !!
भेद-भाव से परे
सदा है, पावन गंगा रहती !
सब की प्यास
बुझाती है यह, सब के हित है बहती !!
इस गंगा की तरह
हृदय हम, अपना व्यापक कर लें-
जो भी आये
प्यार से मिलने, अपना उसे बनाएँ !
आज प्यार की गंगा हम सब, मिल कर स्वच्छ बनाएँ
!!1!!
गंगा की लहरों
में हम सब, दोष चित्त के धो लें !
प्रगति करें, पर
मत गंगा में कड़वे विष-रस घोलें !!
तरक्कियों में
अपराधों को हम मत पलने दें अब-
विकास के
श्रापों से बच कर, खुद को तनिक उठाएँ !
आज प्यार की गंगा हम सब, मिल कर स्वच्छ
बनाएँ !!2!!
गंगा में
डुबकियाँ लगा कर, पाप सदा धोते हैं !
रोज़ नहाते
सुबह-शाम पर, पाप न कम होते हैं !!
दान-पुण्य की
नौटंकी का यहाँ बोलबाला है !
मन पर पाखण्डों
के गँदले, हम मत दाग़ लगाएँ !
आज प्यार की गंगा हम सब, मिल कर स्वच्छ बनाएँ !!3!!
भजन-भाव में
मैल घुल रहा, देखो साँझ-सकारे !
गंगा में दम
कहाँ रह गया, इतने पाप निखारे !
सच्चे
चिन्तन-मनन से बढ़के, कोई भजन नहीं है !
मिथ्या
आराधन-नाटक से, खुद को मत बहलाएँ !
आज प्यार की गंगा हम सब, मिल कर स्वच्छ बनाएँ
!!4!!
सच्चे चिन्तन-मनन से बढ़के, कोइ भजन नहीं है !
मिथ्या आराधन-नाटक से, खुद को मत बहलाएँ !
बेहतरीन बात कही है सच्चे चिंतन मनन से न कोई भजन है न प्रार्थना है !
सुन्दर रचना है बधाई !