जून 2014 के बाद की गज़लें/गीत(19) पूजा करने चले (‘ठहरो मेरी बात सुनो !’ से)
>> Tuesday, 4 November 2014 –
गीत
(सारे चित्र' 'गूगल-खोज' से साभार)

पूजा करने चले बना के,
ऊँची बड़ी इमारत !
बिना प्यार के हो न
सकेगी, सच्ची कभी इबादत !
बजा के घंटी, चढ़ा मिठाई,
भजन-कीर्त्तन करते !
और कई तो रगड़ के माथा,
हैं धरती पर झुकते !!
बिना ध्यान के, चंचल मन
से, पाठ किया करते हैं !
बिना
आस्था-श्रद्धा-निष्ठा, पढ़ते कथा-तिलाबत !
बिना प्यार के हो न
सकेगी, सच्ची कभी इबादत !!1!!
खुदा से धन औ ऐश माँगते,
पूरी करने मन्नत !
बने भिखारी, रिरियाते
हैं, करें खुशामद-मिन्नत !!
थोड़ा दे कर, मिले अधिक
यह, ललक है कैसी मन में ?
हुये मज़हबी ज्यों
व्यापारी, मज़हब बने तिजारत !
बिना प्यार के हो न
सकेगी, सच्ची कभी इबादत !!2!!
माटी के भी सनम भले हैं,
अगर लगन है सच्ची !
वरना पत्थर तो पत्थर है,
प्रीति अगर है कच्ची !!
टूट चुके ईमान, भटकते
हुये यक़ीन को लेकर-
मन में लाखों ख्वाहिश
पाले, करने चले जियारत !
बिना प्यार के हो न
सकेगी, सच्ची कभी इबादत !!3!!
इश्क़ बिना
अरदास-प्रार्थना, फलती नहीं कभी भी !
बिना प्यार बलिदान किस
तरह, होगी सफल मसीही ??
पैमाने मानवता के
हैं, टूटे - टूटे दरके !
रह्मानों में शैतानों की,
जब से हुई मिलावट !
बिना प्यार के हो न
सकेगी, सच्ची कभी इबादत !!4!!