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जून २०१३ के बाद के गीत/गज़लें (ब)(1) दिये तो जलाओ !(‘शंखनाद’ से)

चलन रोशनी का कोई तो चलाओ !! 
अँधेरे घने हैं, दिये तो जलाओ !
निराशा का माना कि है बोलबाला | 
नहीं पास कोई है उम्मीद वाला ||
माना कि तुम थक गये चीख कर के-
नहीं टेर को कोई है सुनने वाला ||
मगर टिमटिमाते दिए की तरह जो- 
जगी आस है जो उसे मत सुलाओ !!
चलन रोशनी का कोई तो चलाओ  
अँधेरे घने हैं, दिये तो जलाओ !!1!!
प्रयासों की चिमटी उतारी तो होगी ! 
बुझी राख में भी चिनगारी तो होगी !!
कि, इन चुप्पियों में दबे स्वर तो होंगे ! 
घुटी चीख की कुछ शुमारी तो होगी !!
धीरज बँधाओ औ दहशत हटाओ ! 
मरते स्वरों को तो जीवन दिलाओ !!
चलन रोशनी का कोई तो चलाओ !  
अँधेरे घने हैं, दिये तो जलाओ !!2!!
मानाकि कोशिश अब थक चुकी है | 
बगावत की चाहत भी मिट चुकी है |
चुभन झेल ली और उफ़ तक न की है ! 
उँगली में पैनी अनी चुभ चुकी है !!
गुलाबों की बगिया में ऐसा तो होगा- 
चुभे कोई काँटा तो मत तिलमिलाओ !
चलन रोशनी का कोई तो चलाओ !  
अँधेरे घने हैं, दिये तो जलाओ !!3!!
माना बड़ी है विकारों की दुनियाँ | 
बहुत छोटी है अब सुधारों की दुनियाँ ||
बड़ी जान है पतझरों की ह्वा में-  
बेकस है माना बहारों की दुनियाँ ||
माली बहुत आस खोये हुये हैं- 
“प्रसून” इनको जाकर दिलासा दिलाओ !!
चलन रोशनी का कोई तो चलाओ ! 
अँधेरे घने हैं, दिये तो जलाओ !!4!!

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