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गज़ल-कुञ्ज (गज़ल-संग्रह) (अ)प्रियतम प्रणाम(आराधना गज़ल) (१) प्रियतम प्रणाम -(ख) प्रियतम तुमको मेरा प्रणाम

 
 (१)प्रियतम प्रणाम (क्रमश:)--

(ख)प्रियतम तुमको मेरा प्रणाम !
!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
तुम अनाम फिर भी कोटिनाम |
प्रियतम तुमको मेरा प्रणाम !!

निर्बाध 'काल'की गति मन्थर-
रोकते उसे भी दे विराम ||
 
कण कण में तुम रमते हो यों-
कहते तुमको लोग राम ||

कामना-हीन निष्काम हो तुम !
पर तुम हो अनन्त सत्य काम || 
 
अनिकेत,किन्तु सर्वत्र व्याप्त |
जड़- चेतन सबके परम धाम || 

जो मिले, तुम्हारी कृपा -गन्ध-
हो जाये 'प्रसून' धन्य नाम ||


डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण)  – (17 June 2012 at 05:14)  

बहुत शानदार लिखा है आपने!
पितृदिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण)  – (18 June 2012 at 04:48)  

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल सोमवार (19-06-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

Amrita Tanmay  – (19 June 2012 at 04:00)  

बहुत सुन्दर ...

veerubhai  – (19 June 2012 at 06:56)  

कण कण में तुम रमते हो यों-
कहते तुमको लोग राम ||
आध्यात्मिक हाइकु का मजा दे गया ग़ज़ल आराधन .

राम की महिमा को आपने ग़ज़ल में कहा .वाह अभिनव प्रयोग .बहुत खूब .

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