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मौसमके उपहार

प्रीति -डोर में हमें बाँधने को आया मौसम |
बिखरे रिश्ते, इन्हें साधने को आया मौसम||

वन में नाचे मोर , बादलोँ को जब देखा है-
बात नहीं यह सत्य,नाचने को आया मौसम||

खट्टे-मीठे फल गदराये , पके रसीले हैं-
लगता है उपहार बाँटने को आया मौसम||

बन्ध तनावों के ये सुंदर कस कर जकड़े हैं-
मानो सारे बन्ध काटने को आया है मौसम||

एक शैड में बैठे हैं वारिश से बचने को-
नफ़रत की खाइयाँ बाँटने को आया मौसम||
खिले "प्रसून" सभी डालों पर ,किलकारी भर के-
सुस्ती वाला जाल काटने को आया मौसम||

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण)  – (30 March 2012 at 04:12)  

बहुत बढ़िया प्रस्तुति!
घूम-घूमकर देखिए, अपना चर्चा मंच
लिंक आपका है यहीं, कोई नहीं प्रपंच।।
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

Rajesh Kumari  – (30 March 2012 at 20:42)  

vaah bahut achchi kavita likhi hai

वन में नाचे मोर , बादलोँ को जब देखा है-
बात नहीं यह सत्य,नाचने को आया मौसम||
in panktiyon ne to dil moh liya.

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib')  – (31 March 2012 at 03:05)  

बहुत सुंदर गीत....
हार्दिक बढ़ाई।

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu"  – (31 March 2012 at 11:10)  

ek shaid me baithe hain..ye panktiyan mujhe behad pasand aayeen..sadar badhayee aaur amantran ke sath

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